तो झूलों तुम संग हरें हरें जो झुलाओ।
तुम तो देत अटपटि बिच बिच झूलत मोहि डराओ॥ [1]
राग मल्हार भांत भांतन सों स्वर बांधिकें गाय सुनाऊँ।
रसिक प्रीतम सों कहत पियारी तो तजि चित अनत न लाऊँ॥ [2]
- श्री हरिराय जी
श्री राधिका प्यारी श्री कृष्ण से कह रहीं हैं कि यदि आप धीरे-धीरे झुलाओ तो आपके संग झूलूँ। आप तो ऊटपटांग झोंटा देकर मुझे डराते हो। [1]
यदि आप धीरे-धीरे झुलाओ तो आपको राग मल्हार भांति-भांति से स्वर बांध कर गाकर सुनाऊँ। हे रसिक बिहारी प्रियतम, आपको छोड़ कर मेरा चित्त कहीं और कभी नहीं लगता है। [2]
तुम तो देत अटपटि बिच बिच झूलत मोहि डराओ॥ [1]
राग मल्हार भांत भांतन सों स्वर बांधिकें गाय सुनाऊँ।
रसिक प्रीतम सों कहत पियारी तो तजि चित अनत न लाऊँ॥ [2]
- श्री हरिराय जी
श्री राधिका प्यारी श्री कृष्ण से कह रहीं हैं कि यदि आप धीरे-धीरे झुलाओ तो आपके संग झूलूँ। आप तो ऊटपटांग झोंटा देकर मुझे डराते हो। [1]
यदि आप धीरे-धीरे झुलाओ तो आपको राग मल्हार भांति-भांति से स्वर बांध कर गाकर सुनाऊँ। हे रसिक बिहारी प्रियतम, आपको छोड़ कर मेरा चित्त कहीं और कभी नहीं लगता है। [2]

