(राग विहागरौ)
मेरी अखियाँ रूप के रंग रँगीं ।
युगल चंद अरविन्द वदन छवि, तिहि रस माहिं पगीं ।। [1]
नव-नव भाइ विलास माधुरी, रहिं सुख स्वाद लगीं ।
‘हित ध्रुव’ और जहाँ लगि रुचि ही, ते सब छाँड़ि भगीं ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (90)
हे सखि ! मेरे नेत्र रूप के रँग में रँग गये हैं । वे चन्द्रमा रूपी युगल किशोर के बदनारविन्द की शोभा के रस में पगे हुये हैं । [1]
मेरे ये नेत्र लडिली लाल के नित्य नव विलासमयी माधुरी के सुख - स्वाद में ही निरन्तर संलग्न रहते हैं । श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि अन्य जितनी भी रुचियाँ एवं प्रवृत्तियाँ हैं उन सब मेरे नयनों ने सर्वथा त्याग कर दिया है । [2]
मेरी अखियाँ रूप के रंग रँगीं ।
युगल चंद अरविन्द वदन छवि, तिहि रस माहिं पगीं ।। [1]
नव-नव भाइ विलास माधुरी, रहिं सुख स्वाद लगीं ।
‘हित ध्रुव’ और जहाँ लगि रुचि ही, ते सब छाँड़ि भगीं ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (90)
हे सखि ! मेरे नेत्र रूप के रँग में रँग गये हैं । वे चन्द्रमा रूपी युगल किशोर के बदनारविन्द की शोभा के रस में पगे हुये हैं । [1]
मेरे ये नेत्र लडिली लाल के नित्य नव विलासमयी माधुरी के सुख - स्वाद में ही निरन्तर संलग्न रहते हैं । श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं कि अन्य जितनी भी रुचियाँ एवं प्रवृत्तियाँ हैं उन सब मेरे नयनों ने सर्वथा त्याग कर दिया है । [2]

