वृंदावन की बात में, जितै जितै मन जात ।
तितै तितै ताते अधिक, चितवत चित न अघात ॥
- श्री माधुरी दास, केलि माधुरी (10)
वृन्दावन की लीलाओं में मन जहाँ-जहाँ प्रविष्ट होता है, वहीं-वहीं वह और अधिक रस का अनुभव करता है। आश्चर्य यह है कि चित्त उस रस से कभी भी तृप्त नहीं होता, बल्कि निरंतर और अधिक चाहने लगता है।
तितै तितै ताते अधिक, चितवत चित न अघात ॥
- श्री माधुरी दास, केलि माधुरी (10)
वृन्दावन की लीलाओं में मन जहाँ-जहाँ प्रविष्ट होता है, वहीं-वहीं वह और अधिक रस का अनुभव करता है। आश्चर्य यह है कि चित्त उस रस से कभी भी तृप्त नहीं होता, बल्कि निरंतर और अधिक चाहने लगता है।

