परिचय :
श्री माधुरीदास जी सखीभाव के सुदृढ़ उपासक थे। श्रीराधाचरण जी गोस्वामी ने इनके परिचय में एक छप्पय 'नव भक्तमाल' में लिखा है :
उज्वल रस अनुराग, राग-मारग विस्वासी।
राग-रंग में कुशल, माधुरी- कुंड-निवासी॥
लता माधुरीध्येय गेय गोपीजनवल्लभ।
अष्टजाम अभिराम भावना सुख नित तल्लभ॥
दान, मान, वंशी, विपिन, केलि कला अभिलाष की।
माधुरी भई षट् माधुरी, मधुर माधुरीदास की॥
माधुरीदास जी माधुरी कुण्ड के निवासी थे। गान-कला में कुशल थे। गोपीजनवल्लभ श्रीकृष्ण के उपासक थे। उज्वल रस के में इनकी प्रीति थी, प्रेमा-भक्ति इनका मार्ग था। अष्टयाम भावना में सदैव तल्लीन रहते थे। इन्होंने दान-माधुरी, मान-माधुरी, वंशी-माधुरी, विपिन माधुरी, केलि-माधुरी और अभिलाष -माधुरी इन छः माधुरी ग्रन्थों की रचना की। माधुरी दास की ये माधुरी अत्यंत मधुर हैं।
आध्यात्मिक जीवन :
श्री माधुरीदास जी चैतन्य (गौड़ीय सम्प्रदाय) सम्प्रदाय के अनुगत आचार्य श्री रूप गोस्वामी के शिष्य थे। इनका स्थित-काल तो 1543-1643 तक माना गया है, किन्तु रचना काल 1630 केलिमाधुरी के अनुसार ही मान्य है। मथुरा से गोवर्धन की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित अडींग नामक गाँव है। इस ग्राम से दक्षिण की ओर ढाई कोस के अन्तर पर, माधुरी कुंड ही माधरी जी के साधना स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। इस कुण्ड के विषय में लिखा है - "गोस्वामी श्री नारायण भट्ट जी द्वारा विरचित ब्रज भक्ति विलास ग्रंथ के मत में श्री प्रिया जी की अति सुहावनी माधुरी नाम्नी सखी के विहार स्थल के कारण उस स्थान तथा कुंड का नाम माधुरी कुण्ड है।” कुण्ड के पास एक सुन्दर मन्दिर है। मथुरा निवासी कृष्ण गंगा स्थान के महन्त बाबा श्री बलरामदास जी की देखरेख में है। श्री माधुरीदास जी असाधारण कोटि के विद्वान तथा श्रीराधा युगल के लीला गान के अनन्य रसिक गायक थे।
रचना :
श्री माधुरीदास जी की रचनाओं में उत्कण्ठा माधुरी, वंशीवट विलास माधुरी, केलिमाधुरी, वृन्दावन विहार माधुरी, दानमाधुरी, मानमाधुरी, होरी माधुरी तथा प्रिया जू की बधाई ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
'नव भक्तमाल' में श्री राधाचरण गोस्वामी ने इनके विषय में एक परिचयात्मक छप्पय भी लिखा है -
श्री माधुरीदास जी विरचित-उत्कण्ठाओं में कवि का प्रेम, वियोगजनित वेदना तथा श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य अनुराग का वर्णन है। वंशीवट माधुरी में यमुना पुलिन के विविध विलास रूपों का चित्रण है, केलिमाधुरी में श्रीयुगल की दिव्य केलि का निरूपण है, वृन्दावन माधुरी में जीवन की शोभा परिलक्षित है, दान माधुरी में श्रीकृष्ण का हास-परिहास दृष्टिगोचर है, मान माधुरी में प्रिया जी के मान का दर्शन है और होरी माधुरी में होली के माधुर्य का भी अत्यन्त सरस रूप दिखाई देता है।
माधुरीदास जी के उपर्युक्त सभी माधुरी ग्रन्थ संकलित पदों की होरी माधुरी के साथ माधुरी-वाणी के नाम से प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी एक रचना केलि माधुरी में उसका रचनाकाल 1630 दिया हुआ है।
श्री माधुरी जी की रचनाएँ ब्रजभाषा-काव्य की उत्तम निदर्शन हैं। भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से ये सुंदर हैं। सखीभाव इनकी उपासना का मूल भाव है। उत्कंठा या अभिलाष-माधुरी में इन्होंने सहचरी को ही सब रसों का मूल माना है
अहो विशाखा सहचरी, तुम सब रस की मूल।
यह उत्कण्ठा बेलि ज्यौं, नख सिख फूलै फूल॥
"हे विशाखादी सखियाँ, आप सब रस की मूल हैं"
माधुरी जी की उत्कंठा है कि वे प्रिया-प्रियतम का नवल विहार अपने नेत्रों से देखें और अपने हाथ से उनका शृङ्गार करें :
एक बार इन लोचननि देखों नवल विहार।
इनही हाथन दुहुन को, करौं बैठि शृङ्गार॥
मेरी यह अभिलाषा है की एक बार श्री राधा कृष्ण के नित्य विहार का अपनी आँखों से दर्शन करूँ, अपने हाथों से दोनों का बैठकर श्रृंगार करूँ।

