(सवैया)
वह और की आशा करे-न-करे,
जिसे आश्रय श्री हरि नाम का है। [1]
उसे स्वर्ग से मित्र प्रयोजन क्या,
नित वासी जो गोकुल धाम का है॥ [2]
बस, सार्थक जन्म उसी का यहाँ,
‘हरे कृष्ण’ जो चाकर श्याम का है। [3]
बिना कृष्ण के दर्शन के जग में,
यह जीवन ही किस काम का है॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
जो श्री हरि के नाम को अपना एकमात्र आश्रय बना चुका है, उसे किसी और से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। [1]
जो नित्य गोकुल धाम का वासी है, उसे स्वर्ग के सुख से क्या प्रयोजन? [2]
श्री हरे कृष्ण जी कहते हैं—इस संसार में वही जीवन सार्थक है, जो श्री श्यामसुंदर की सेवा में समर्पित है। [3]
भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना यह जीवन व्यर्थ है, इसका कोई मूल्य नहीं। [4]
वह और की आशा करे-न-करे,
जिसे आश्रय श्री हरि नाम का है। [1]
उसे स्वर्ग से मित्र प्रयोजन क्या,
नित वासी जो गोकुल धाम का है॥ [2]
बस, सार्थक जन्म उसी का यहाँ,
‘हरे कृष्ण’ जो चाकर श्याम का है। [3]
बिना कृष्ण के दर्शन के जग में,
यह जीवन ही किस काम का है॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
जो श्री हरि के नाम को अपना एकमात्र आश्रय बना चुका है, उसे किसी और से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए। [1]
जो नित्य गोकुल धाम का वासी है, उसे स्वर्ग के सुख से क्या प्रयोजन? [2]
श्री हरे कृष्ण जी कहते हैं—इस संसार में वही जीवन सार्थक है, जो श्री श्यामसुंदर की सेवा में समर्पित है। [3]
भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के बिना यह जीवन व्यर्थ है, इसका कोई मूल्य नहीं। [4]

