पौढे ललित लतानि तरै - श्री भगवत रसिक, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.4)

पौढे ललित लतानि तरै - श्री भगवत रसिक, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.4)

(राग सारंग)
पौढे ललित लतानि तरै ।
सुमन-सेज सुखरासि सनेही, अधरनि अधर धरें ।।
उरजनि उरज जोरि कटि सौं कटि, लपटि भुजानि भरें ।
यह रसमत्त मगन मन सोये, भगवत ब्यजन करें ।।

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.4)

सुख राशि श्रीप्रिया प्रियतम सुंदर लताओं के नीचे सुमनों की सेज पर लेटे हैं। इस प्रेमी युगल के अधर अधरों से और उरोज उरोजों से सटे हैं, कटि से कटि जुड़ी है और दोनों ने लिपटकर एक दूसरे को भुजाओं में भर रखा है। इस प्रकार आनंदोन्मत्त प्रिया प्रियतम इस अद्भुत रस में निमग्न मन होकर सो रहे हैं और भगवत अलिजी उनका पंखा झल रही हैं ।