नित्य विहार अखंड है - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (78)

नित्य विहार अखंड है - श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (78)

नित्य विहार अखंड है, ता निजु धर्महि मानि ।
औतार कथा है जहाँ लौ, सो उपधर्महि जानि ॥

- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (78)

श्री स्वामी हरिदास जी की उपासना में प्रिया-प्रियतम का अखंड नित्य-विहार ही प्रधान उपास्य तत्त्व है और वही उनका निज धर्म है। जहाँ अवतार-कथा का प्रवेश हो जाता है, उसे इस उपासना से भिन्न मार्ग मानना चाहिए, क्योंकि वहाँ नित्य-विहार खंडित हो जाता है।