(दोहा)
प्रेम कला सुर सहित पिय, कहत प्रिया सौं बैन।
हार उदार निहार उर, चहत चतुर चित लैंन॥
(पद) [इकताल, राग-गौरी]
परस्पर निरषि थकित भये नैन।
प्रेम कला भरि सुर राधे सौं, बोलत अमृत बैन॥
हार उदार निहार तिहारौ, राधे यह मन लैन।
श्रीभट लटक जानि हितकारिनि, भई स्याम सुष दैन॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (55)
(दोहा)
श्रीवृन्दावन की निभृत निकुञ्जों में श्रीप्रिया-प्रियतम विहार कर रहे हैं। श्रीप्रियाजी के वक्ष पर पुष्प-हार को देख श्रीलालजी का मन प्रेम की मधुर अभिलाषाओं से उत्कंठित हो उठता है और वे प्रियाजी से उनके हृदय से स्पर्श किए हुए हार की याचना करते हैं।
(पद)
श्री प्रिया जी की अति सुंदर झांकी देख कर श्री श्याम सुंदर के नेत्र थकित से रह गए। प्रेमकला युक्त प्रियतम प्रणय कौशल भरे अमृत-मधुर स्वर से श्रीप्रियाजी की मनुहार करते हुए कहते हैं - हे उदार चूडामणि श्रीराधे! तुम्हारे वक्षःस्थल पर सुशोभित यह सुगंधित पुष्पों का हार मुझे बड़ा हो सुन्दर लग रहा है, (इसका दर्शन प्राप्त कर मुझे परम-सुख को अनुभूति हो रही है)। मेरा चंचल मन तुम्हारे इस हार को लेने के लिए उतावला हो उठा है। श्रीभट्टजी कहते हैं— श्रीलालजी की ऐसी प्रेम-भरी याचना को सुनकर परम हितकारिणी श्री प्रियाजी का हृदय द्रवित हो उठा। वे उनके मधुर मनोरथ (अंग-स्पर्श की लालसा) को जानकर उनको अति आतुर देख उन्हें हार उतारने के लिए कह देती हैं। श्रीलालजी हार उतार कर अपने गले में धारण कर लेते हैं। परस्पर अंग-स्पर्श होने से जो सुख बढ़ा, उसका दर्शन कर सहचरियाँ सफल मनोरथ हो जाती हैं।
प्रेम कला सुर सहित पिय, कहत प्रिया सौं बैन।
हार उदार निहार उर, चहत चतुर चित लैंन॥
(पद) [इकताल, राग-गौरी]
परस्पर निरषि थकित भये नैन।
प्रेम कला भरि सुर राधे सौं, बोलत अमृत बैन॥
हार उदार निहार तिहारौ, राधे यह मन लैन।
श्रीभट लटक जानि हितकारिनि, भई स्याम सुष दैन॥
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (55)
(दोहा)
श्रीवृन्दावन की निभृत निकुञ्जों में श्रीप्रिया-प्रियतम विहार कर रहे हैं। श्रीप्रियाजी के वक्ष पर पुष्प-हार को देख श्रीलालजी का मन प्रेम की मधुर अभिलाषाओं से उत्कंठित हो उठता है और वे प्रियाजी से उनके हृदय से स्पर्श किए हुए हार की याचना करते हैं।
(पद)
श्री प्रिया जी की अति सुंदर झांकी देख कर श्री श्याम सुंदर के नेत्र थकित से रह गए। प्रेमकला युक्त प्रियतम प्रणय कौशल भरे अमृत-मधुर स्वर से श्रीप्रियाजी की मनुहार करते हुए कहते हैं - हे उदार चूडामणि श्रीराधे! तुम्हारे वक्षःस्थल पर सुशोभित यह सुगंधित पुष्पों का हार मुझे बड़ा हो सुन्दर लग रहा है, (इसका दर्शन प्राप्त कर मुझे परम-सुख को अनुभूति हो रही है)। मेरा चंचल मन तुम्हारे इस हार को लेने के लिए उतावला हो उठा है। श्रीभट्टजी कहते हैं— श्रीलालजी की ऐसी प्रेम-भरी याचना को सुनकर परम हितकारिणी श्री प्रियाजी का हृदय द्रवित हो उठा। वे उनके मधुर मनोरथ (अंग-स्पर्श की लालसा) को जानकर उनको अति आतुर देख उन्हें हार उतारने के लिए कह देती हैं। श्रीलालजी हार उतार कर अपने गले में धारण कर लेते हैं। परस्पर अंग-स्पर्श होने से जो सुख बढ़ा, उसका दर्शन कर सहचरियाँ सफल मनोरथ हो जाती हैं।

