एवं नित्यमनुस्मरन्ननुसरन् राधापदाम्भोरुह च्छायामेव तयोः सदैव रसनां नामामृतैः पूरयन् ।
स्त्री-तत्संगगिविदूर एवं विचरन्नत्युत्कटत्वं नयन् वैराग्यं क्रमशो वसत्यतिकृती कोऽप्यत्र वृन्दावने ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.65)
श्रीराधा का नित्य स्मरण करते हुए, उनके चरणकमलों की कांति का नित्य अनुस्मरण करते, उनके नाम में नित्य ही रसना को पूर्ण करते, करते, स्त्री तथा स्त्री का संग करने वालों के संग को विषय के समान त्याग कर क्रमशः अति तीव्र वैराग्याश्राय करके कोई एक अतिशय भाग्यवान पुरुष ही श्रीवृन्दावन में वास करता है।
स्त्री-तत्संगगिविदूर एवं विचरन्नत्युत्कटत्वं नयन् वैराग्यं क्रमशो वसत्यतिकृती कोऽप्यत्र वृन्दावने ।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.65)
श्रीराधा का नित्य स्मरण करते हुए, उनके चरणकमलों की कांति का नित्य अनुस्मरण करते, उनके नाम में नित्य ही रसना को पूर्ण करते, करते, स्त्री तथा स्त्री का संग करने वालों के संग को विषय के समान त्याग कर क्रमशः अति तीव्र वैराग्याश्राय करके कोई एक अतिशय भाग्यवान पुरुष ही श्रीवृन्दावन में वास करता है।

