उर भीतर अति चाहना, बाहर राखत त्याग  - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (30)

उर भीतर अति चाहना, बाहर राखत त्याग - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (30)

उर भीतर अति चाहना, बाहर राखत त्याग ।
नारायण वा त्याग पै, परो भार की आग ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (30)

यदि हृदय के भीतर अनंत चाहें भरी हुई हैं, परंतु केवल बाहरी त्याग रखा हुआ है, तो ऐसा त्याग व्यर्थ है; वह निश्चित ही माया द्वारा परास्त हो जाएगा।