किशोरी मोहे सोहनी देन सिखावो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (22)

किशोरी मोहे सोहनी देन सिखावो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (22)

(राग पूरिया, त्रिताल)
किशोरी मोहे सोहनी देन सिखावो।
हे, मंद मुस्काये लाड़ली, नव नव कृपा कोर बरसाओ॥ [1]
कोटि किरण छिड़कत अंगन में, बेगि कृपा करी धावो।
तब बोलो हंस-हंस के श्यामा, मंद स्वरन बतलावो॥ [2]
ऐसी सेवा करो री बांवरी, तो गाल पे मीठी सी चपत लगाओ।
श्री गोपाल हित ललित लाड़िली श्री हित सजनी कि दासी बनाओ ॥ [3]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (22)

हे श्री राधा, मुझे सोहनी सेवा करना सीखा दो। हे लाड़िली, मंद-मंद मुस्कुराकर नव कृपा की कोर बरसाइये। [1]

हे किशोरी, आपके अंगों से प्रकाश के कोटि-कोटि किरण निसृत हो रही हैं, मुझपर कृपा करने के लिए शीघ्र दौड़ कर आइये। फिर मुझसे हंस-हंस के बोलिये, मंद स्वर में बातें कीजिये। [2]

"अरी बावरी, ऐसे-ऐसे सेवा कर" ऐसा कह कर हे श्री राधा, मुझे सेवा करना सिखाइये, इसपर भी मैं ठीक से सेवा न कर पाऊं तो मेरे गाल पर मीठी सी चपत लगाइये। श्री गोपालदास जी कह रहे हैं "हे श्री ललित लाडिली जू, मुझे हित सजनी की दासी बना दीजिये।" [3]