युगल प्रेम रसमाधुरी, तहाँ न अटकै चित्त ।
चखत फिरै माया फलनि, तहाँ रहै दुःख नित्त ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (10)
आश्चर्य की बात है कि विषयों में आसक्त जीव नित्य दुःख देने वाले मायिक फलों का ही आस्वादन करता फिरता है, किन्तु नित्य आनंद देने वाली युगल प्रेम-रस-माधुरी में अपने मन को स्थिर नहीं करता।
चखत फिरै माया फलनि, तहाँ रहै दुःख नित्त ॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, ख्याल हुल्लास (10)
आश्चर्य की बात है कि विषयों में आसक्त जीव नित्य दुःख देने वाले मायिक फलों का ही आस्वादन करता फिरता है, किन्तु नित्य आनंद देने वाली युगल प्रेम-रस-माधुरी में अपने मन को स्थिर नहीं करता।

