आवत री यमुना भर पानी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर

आवत री यमुना भर पानी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर

(राग सारंग)
आवत री यमुना भर पानी ।
सांबरे वरण ढोटा कोंन कोरी माई
वाकी चितवन मेरी गेल भुलानी ।। [1]
हों सकुची मेरे नयन सकुचे इन नयनन के हाथ विकानी ।
‘परमानंद’ प्रभु प्रेम समुद्र में ज्यों जलधर की बूंद समानी ।। [2]

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर

अरी सखी आज मैं श्री यमुनाजी का पानी भरके आ रही थी, गैल में न जानें साँवरे स्वरूप वाले ने क्या जादू कर दिया कि उसकी चितवन की कोर से मैं मार्ग ही भूल गयी  । [1]

मैं उससे नयन संकोचवश न मिला सकी, परंतु उसके चितवन ने तो मेरा मन ही मोह लिया जैसे समुद्र में एक मेघ की बूँद समा जाती है । प्रेम के समुद्र में प्रेम की पगी से परमानंद पा कर विभोर सी हो गयी । [2]