हठ करि रही प्रिया बातौ न कहई  श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (38)

हठ करि रही प्रिया बातौ न कहई श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (38)

(राग केदारौ)
हठ करि रही प्रिया बातौ न कहई ।
ललिता तू समुझाई जुगति करि जैसें रस रहई ।। [1]
तन-मन वारौं एक रोम पर, जो नेंक इतै चितई ।
श्रीबीठलविपुल विनोद बिहारी कहत सखी सौं,
करि जतन ज्यौं रस रहई ।। [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, विट्ठल विपुल देव जू की बानी (38)

श्रीललिताजी से अपने हृदय की असहय अकुलाहट को अभिव्यक्त करते हुए लाल ने कहा कि सखि ! प्रिया ने इस प्रकार हठ धारण कर लिया है कि वे कुछ बोलतीं भी तो नहीं। आप ही कोई ऐसी युक्ति का संप्रयोग करें, जिससे रस बना रहे। [1]

यदि वे किंचित् भी मेरी ओर दृष्टिपात कर दें तो मैं अभिभूत होकर उनके एक रोम की माधुरी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दूँ । पुनः सखी से अनुनय-विनय पूर्वक लाल ने कहा कि ऐसा यत्न करें कि रस बना रहे । [2]