नाहिं लोक सों लाज है, नाहिं वेद सों काज ।
एक कुंवरि सौं काज है, और करौ सब राज॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (23)
अब न तो मुझे लोक-मर्यादा की कोई लज्जा है और न ही वेदों के विधान से मेरा कोई प्रयोजन रह गया है। मेरा एकमात्र सम्बन्ध तो केवल श्री राधा महारानी जू से है; शेष सारा राज-पाठ या संसार मेरे लिए व्यर्थ है।
एक कुंवरि सौं काज है, और करौ सब राज॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (23)
अब न तो मुझे लोक-मर्यादा की कोई लज्जा है और न ही वेदों के विधान से मेरा कोई प्रयोजन रह गया है। मेरा एकमात्र सम्बन्ध तो केवल श्री राधा महारानी जू से है; शेष सारा राज-पाठ या संसार मेरे लिए व्यर्थ है।

