रसिक दोऊ मंडल रास रचावैं ।
झमकि रही चहुँ ओर सखी जन, बीन मृदंग बजावैं ।। [1]
जब गति लेत छबीली छवि सौं, पिय पग मुकुट छुवावैं ।
निरखि ‘किशोरी’ रूप अलीगन, तन मन नैंन सिरावैं ।। [2]
- श्री किशोरी अलि जी, वर्षोत्सव, रास के पद (6)
दो रसिक जन रास मंडल में रास रचा रहे हैं । चारों ओर सखी जन झूम रही हैं और वीणा एवं मृदंग बजा रही हैं । [1]
रास के मध्य जब श्री छबीली जी अद्बुत गति से नृत्य करती हैं तो श्याम सुंदर अपना मुकुट श्री प्रिया ज़ू के चरणों में छुवा देते हैं । श्री किशोरी अलि जी कहती हैं कि श्री राधा कृष्ण का यह रूप आलिंगन देखकर उनका तन, मन, एवं नैंन शीतल [तृप्त] हो रहे हैं । [2]
झमकि रही चहुँ ओर सखी जन, बीन मृदंग बजावैं ।। [1]
जब गति लेत छबीली छवि सौं, पिय पग मुकुट छुवावैं ।
निरखि ‘किशोरी’ रूप अलीगन, तन मन नैंन सिरावैं ।। [2]
- श्री किशोरी अलि जी, वर्षोत्सव, रास के पद (6)
दो रसिक जन रास मंडल में रास रचा रहे हैं । चारों ओर सखी जन झूम रही हैं और वीणा एवं मृदंग बजा रही हैं । [1]
रास के मध्य जब श्री छबीली जी अद्बुत गति से नृत्य करती हैं तो श्याम सुंदर अपना मुकुट श्री प्रिया ज़ू के चरणों में छुवा देते हैं । श्री किशोरी अलि जी कहती हैं कि श्री राधा कृष्ण का यह रूप आलिंगन देखकर उनका तन, मन, एवं नैंन शीतल [तृप्त] हो रहे हैं । [2]

