देखो री बाँसुरी में कान्हो राधे राधे गावै री - श्री चंद्रसखी पदावाली (21)

देखो री बाँसुरी में कान्हो राधे राधे गावै री - श्री चंद्रसखी पदावाली (21)

देखो री बाँसुरी में कान्हो राधे राधे गावै री।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बिच में कान्हो रास रचावै री । [1]
मोर मुकुट पीताम्बर सो है कानन में कुण्डल झलकावै री।
‘चंद्रसखी’ भज बालकृष्ण छवि चितवाँ रे चरणाँ जावै री ॥ [2]

- श्री चन्द्रसखी जी, चंद्रसखी पदावाली (21)

अरी सखी देख कान्हा मुरली में राधे राधे गान कर रास रचा रहा है । इधर गोकुल नगरी है, उधर मथुरा, इन दोनों के बीच में रास रचा रहा है । [1]

कान्हा ने मोर मुकुट एवं पीताम्बर धारण कर रखा है, एवं कानों में सुंदर कुंडल झलक रहे हैं । श्री चंद्रसखी [अपने गुरु बालकृष्ण जी के रूप को याद कर]  अपने चित्त को श्री श्यामा श्याम के चरणों में जाने की प्रेरणा दे रहे हैं । [2]