राधा जी हो वृषभानु कुमारी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम तरंग (1)

राधा जी हो वृषभानु कुमारी - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम तरंग (1)

राधा जी हो वृषभानु कुमारी ।
कोटि कोटि ससि नख पर वारौं कीरति दृग उजियारी ।। [1]
सब ब्रज की रानी सुखदानी जसुदानन्द दुलारी ।
‘हरिचंद' के हिये बिराजो मोहन प्राण पियारी ।। [2]

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम तरंग (1)

कुंवरी श्री राधिका ही श्री वृषभानु जी की लाड़ली हैं जिनके चरण नख की कांति पर कोटि कोटि चंद्रमा नयौछावर किए जा सकते हैं । श्री राधिका श्री कीर्ति महारानी के आँखों की उजियारी हैं । [1]

श्री राधा ही समस्त ब्रज की रानी, सुखदानी, एवं श्री यशोदा एवं नंद की दुलारी हैं । श्री भारतेंदु हरिशचंद्र कहते हैं कि हे मोहन की प्राण प्यारी! मेरे हृदय में भी नित्य विराजमान रहिए । [2]