अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि  - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

अहो रसिक सुकुमारी, करौ विनती कर जोरि ।
बंध्यौ रहै मन रैन दिना, तुव प्रेम के डोरि ॥

- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (17)

हे रसिक सुकुमारी लाड़ली श्री राधिके! मैं दोनों हाथों को जोड़कर यही विनती करती हूँ कि मेरा मन दिन-रात, हर क्षण तुम्हारे प्रेम की डोर से बँधा रहे।