(राग बिलावल)
मो मन ऐसी अटक परी ।
विपिन बिहार निहारत सहचरि मूरति हिए अरी ।। [1]
जग के काज अकाज न सूझत प्रलय समान घरी ।
'पीताम्बर' देखे विन तलफत ज्यों जल बिन मछरी ।। [2]
- श्री पीताम्बर देव जी, श्री पीताम्बर देव जू की वाणी (15)
श्री पीतांबर देव सहचरी स्वरूप से कहते हैं कि मेरा मन श्री कुंज बिहारी श्री कुंज बिहारिनी के विपिन विहार में ऐसा अटक गया है कि वह नित्य ही प्रिया प्रियतम के दिव्य स्वरूप को निहारता रहता है । [1]
इस जग के कार्यों से अब इसे कोई मतलब नहीं है, श्री श्यामा श्याम के बिन अब हर क्षण प्रलय के समान लगता है, जिस प्रकार एक मछली तड़पती रहती है वैसे ही मैं भी युगल के बिना तड़पता हूं । [2]
मो मन ऐसी अटक परी ।
विपिन बिहार निहारत सहचरि मूरति हिए अरी ।। [1]
जग के काज अकाज न सूझत प्रलय समान घरी ।
'पीताम्बर' देखे विन तलफत ज्यों जल बिन मछरी ।। [2]
- श्री पीताम्बर देव जी, श्री पीताम्बर देव जू की वाणी (15)
श्री पीतांबर देव सहचरी स्वरूप से कहते हैं कि मेरा मन श्री कुंज बिहारी श्री कुंज बिहारिनी के विपिन विहार में ऐसा अटक गया है कि वह नित्य ही प्रिया प्रियतम के दिव्य स्वरूप को निहारता रहता है । [1]
इस जग के कार्यों से अब इसे कोई मतलब नहीं है, श्री श्यामा श्याम के बिन अब हर क्षण प्रलय के समान लगता है, जिस प्रकार एक मछली तड़पती रहती है वैसे ही मैं भी युगल के बिना तड़पता हूं । [2]

