कोटि कोटि वैकुंठ की, प्रभुताइ धौं कौन ।
ऐसो वृंदाविपिन है, रसिकन कौ रस भौन ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (28)
करोड़ों-करोड़ों वैकुंठोंकी प्रभुता भी जिसके समक्ष हेय प्रतीत होती है, ऐसा श्री धाम वृन्दावन ही रसिकों का साक्षात् रस-स्वरूप निवास-स्थल है।
ऐसो वृंदाविपिन है, रसिकन कौ रस भौन ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (28)
करोड़ों-करोड़ों वैकुंठोंकी प्रभुता भी जिसके समक्ष हेय प्रतीत होती है, ऐसा श्री धाम वृन्दावन ही रसिकों का साक्षात् रस-स्वरूप निवास-स्थल है।

