(राग गौड़)
हरि के अंग कौ चंदन लपटानौ
तन तेरे देखियत जैसैं पीत चोली । [1]
मरगजे अभरन बदन छिपावति
छिपै न छिपायैं मानौं कृष्ण बोली ।। [2]
कहूँ अंजन कहूँ अलक रही खसि
सुरति रंग की पोटैं खोली । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम मिलत बिहारिनी
हार न रह्यौ कंठ बिच ओली ।। [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (97)
एक सखी श्री प्रिया जी से कह रही है- हे श्यामा जू, श्री हरि के अंग से लगा हुआ चंदन आपके तन पर लग गया है । ऐसा लग रहा है, मानो आपने पीले रंग की चोली पहन रखी हो । [1]
आपके बदन पर आभूषण भी खिसक चुके हैं । यह तो छिपाए नहीं छिप रहा मानों श्याम रंग की कोयल गा रही हो ! [2]
आपके नयनों का काजल एवं अलकें बिखरी हुई हैं । यह सब आपके प्रियतम के संग सुरत बिहार का पट खोल रहा है । [3]
श्री हरिदासी सखी के स्वामी बिहारिनि जू [श्री प्यारी जी] से सखी कहती है कि श्याम संग मिलन में आपके कंठ का हार भी टूट कर आपकी झोली में गिर गया है । [4]
हरि के अंग कौ चंदन लपटानौ
तन तेरे देखियत जैसैं पीत चोली । [1]
मरगजे अभरन बदन छिपावति
छिपै न छिपायैं मानौं कृष्ण बोली ।। [2]
कहूँ अंजन कहूँ अलक रही खसि
सुरति रंग की पोटैं खोली । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम मिलत बिहारिनी
हार न रह्यौ कंठ बिच ओली ।। [4]
- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (97)
एक सखी श्री प्रिया जी से कह रही है- हे श्यामा जू, श्री हरि के अंग से लगा हुआ चंदन आपके तन पर लग गया है । ऐसा लग रहा है, मानो आपने पीले रंग की चोली पहन रखी हो । [1]
आपके बदन पर आभूषण भी खिसक चुके हैं । यह तो छिपाए नहीं छिप रहा मानों श्याम रंग की कोयल गा रही हो ! [2]
आपके नयनों का काजल एवं अलकें बिखरी हुई हैं । यह सब आपके प्रियतम के संग सुरत बिहार का पट खोल रहा है । [3]
श्री हरिदासी सखी के स्वामी बिहारिनि जू [श्री प्यारी जी] से सखी कहती है कि श्याम संग मिलन में आपके कंठ का हार भी टूट कर आपकी झोली में गिर गया है । [4]

