श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (57)

श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (57)

(राग विलावल व सारंग)
श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई ।
कोटिचंद मंद करत, नखविधु जुन्हाई ।। [1]
ताप, शाप,  रोग, सोग दारुन दुखहारी ।
कालकूट दुष्टदवन कुंजभवन चारी ।। [2]
स्याम हृदय भूषन युत दूषन जित संगी ।
वृंदावन धूरि धूसर रास रसिक रंगी ।। [3]
सरनागत अभय विरद, पतित पावन वानै ।
व्यास से अति अधम आतुर को, कौंन समानै ।। [4]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (57)

श्री राधा प्यारी के चरणारविंद अत्यंत शीतल हैं । ऐसे श्री चरणों के नख की चाँदनी के समक्ष तो कोटि-कोटि चंद्रमा भी मंद प्रतीत होते हैं । [1]

श्री राधा प्यारी के चरण ताप, शाप, रोग, शोक, दारुण दुःख इत्यादि का हरण करने वाले हैं। यह श्री चरण भयानक काल कूट विष से रक्षा करने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले, एवं श्री कुंज भवन तक पहुँचाने वाले हैं।  [2]

श्री राधा प्यारी के चरण श्री श्याम सुंदर के हृदय का आभूषण हैं, एवं जीव के समस्त दोषों को नाश करने वाले एवं परम हितैषी [सदा साथ देने वाले] हैं ।  श्री वृंदावन की पवित्र भूमि जिन श्री चरणों की रज से नित्य अंकित है, उसी रज को रसिक जन नित्य ही अपने पूरे शरीर से लगाए रहते हैं एवं उन्हीं रसिकों को प्रेम रँग में रंगने वाले यह श्री राधा प्यारी के चरण ही हैं । [3]

श्री राधा प्यारी के चरण शरणागत को अभय प्रदान एवं पतितों को पावन करने वाले हैं । श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि उनके समान अति अधम एवं आतुर जीव को श्री राधा प्यारी के अति करुणा युक्त श्री चरणों के अतिरिक्त कौन अपने श्री चरणों में स्थान दे सकता है? [4]