श्री नागरीदासि अनन्यनि कौ गढ़, बन बाँकौ कहा कोऊ पावै ।
नित्यविहार नित्य सिद्धन को, तू काहे को मूंड मुंडावै ॥
- श्री नागरिदेव जू, श्री नागरिदेव जू की वाणी (8)
हे नागरीदास! यह श्री वृन्दावन रूपी निज-महल अनन्य रसिकों का एकांत रस-विलास का किला है। नित्य-विहार रूपी यह धन नित्य-सिद्धों की निज संपदा है और केवल उनकी कृपा से ही कोई इसे पा सकता है। केवल अपने साधन-बल पर मूँड मुंडाना तो बेकार ही है।
नित्यविहार नित्य सिद्धन को, तू काहे को मूंड मुंडावै ॥
- श्री नागरिदेव जू, श्री नागरिदेव जू की वाणी (8)
हे नागरीदास! यह श्री वृन्दावन रूपी निज-महल अनन्य रसिकों का एकांत रस-विलास का किला है। नित्य-विहार रूपी यह धन नित्य-सिद्धों की निज संपदा है और केवल उनकी कृपा से ही कोई इसे पा सकता है। केवल अपने साधन-बल पर मूँड मुंडाना तो बेकार ही है।

