लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार - श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम-माधुरी (3)

लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार - श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम-माधुरी (3)

लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार ।
जहँ विहरति वृषभानुनन्दिनी, छविनिधि नंदकुमार ।
जहँ चिन्मय सब जीव चराचर, जहँ राधे सरकार ।। [1]
जहँ बसंत ऋतु वास करत नित, भ्रमर करत गुंजार ।
जहँ विकसत नित कुंद केवड़ा, कर्णिकार कचनार ।। [2]
जहँ केकी कोकिला कीर नित, राधे नाम उचार ।
जहँ ‘कृपालु’ जलजा-प्रवेश नहिं, निगम न पावत पार ।। [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम माधुरी (3)

अरे मन दिव्य वृन्दावन की अलौकिक बहार देख, जहाँ पर प्रिया-प्रियतम नित्य ही विहार करते हैं। जहाँ जड़-चेतन समस्त जीव चिन्मय हैं, जहाँ की महारानी राधा ठकुरानी हैं । [1]

जहाँ नित्य ही बसंत ऋतु का निवास है तथा जहाँ खिले हुए कुन्द, केवड़ा, कर्णिकार, कचनार आदि फूलों पर भौंरे गुंजार किया करते हैं। [2]

जहाँ मोर, कोयल, तोते आदि भी निरन्तर ‘राधे-राधे’ पुकारा करते हैं। श्री कृपालु जी कहते हैं कि जहाँ महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं है एवं जहाँ वेदों की भी गति नहीं है। [3]