सर्वथा सार सारैक नखचन्द्र-सुधालवे ।
कथं त्वच्चरणाम्भोज सेवाशां त्युक्त मुत्सहे ।।
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (61)
मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है।
कथं त्वच्चरणाम्भोज सेवाशां त्युक्त मुत्सहे ।।
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (61)
मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है।

