राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (65)

राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (65)

(दोहा)
राधे तेरे रूप की, पटतर कहिये काहि।
सरबस तजि रसबस भये, नैन कोर तन चाहि॥


(पद) [राग - रायसो, ताल - चम्पक]
नैंक नैन की कोर मोरि मोहन बस कीनें।
राधे तेरे रूप की पटतर को दीनें॥ [1]
कमल कोस अलि ज्यौं चलैं तारे रँगभीनें।
श्रीभट तन अंजन छुवै लालन लव लीने॥ [2]

- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (65)

सहचरी-गण श्री प्रियाजी के नेत्रों की स्तुति करती हैं।

(दोहा)
हे श्रीराधे! आपके अनुपम रूप की उपमा भला किससे दी जा सकती है? आपके नयनों के कोर के कटाक्षों के वशीभूत होकर श्रीश्यामसुंदर अपना सर्वस्व न्योछावर कर पूर्णतः आपके ही होकर रह गए हैं।

(पद)
हे राधे तुम्हारे नेत्रों की उपमा देना किसी रसिक कवि के वश की बात नहीं क्यूँकि जो मनमोहन सब के मन को वश में कर लेते हैं, ऐसे मोहन को भी तूने अपने नेत्रकोर को नेक-सा [थोड़ा सा] मोड़कर अर्थात् उनसे कटाक्ष कर अपने आधीन कर लिया है। [1]

जिस प्रकार कमल-सम्पुट में प्रविष्ट भ्रमर शोभायमान लगता है ऐसे ही तुम्हारे नेत्रों के तारे (गोलक) रूपी भ्रमर अंजन से अनुरञ्जित होने के कारण शोभायमान दिखता है। श्री भट्टजी कहते हैं- इस प्रकार श्री प्रियाजी के नेत्रों में लगे हुए कटीले अञ्जन की ओर थोड़ी सी भी दृष्टि के चले जाने पर श्रीलालजी उनके छवि-दर्शन में ही लीन होकर रह जाते हैं। [2]