दोऊ कोक कलानि में, पंडित परम प्रवीन ।
सो रसना कैसे कहौं, रसना नैननि हीन ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, बिहार चंद्रिका (55)
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही रति-कलाओं और दिव्य प्रेम-क्रीड़ाओं में परम चतुर और प्रवीण हैं। इस रस-विलास का जिह्वा द्वारा वर्णन करना असंभव है, क्योंकि रसना में वे नेत्र नहीं हैं जो इस सौंदर्य का अनुभव कर सकें।
सो रसना कैसे कहौं, रसना नैननि हीन ॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, बिहार चंद्रिका (55)
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही रति-कलाओं और दिव्य प्रेम-क्रीड़ाओं में परम चतुर और प्रवीण हैं। इस रस-विलास का जिह्वा द्वारा वर्णन करना असंभव है, क्योंकि रसना में वे नेत्र नहीं हैं जो इस सौंदर्य का अनुभव कर सकें।

