एक नहीं मानेंगे अब हम वृन्दावन जावेंगे  - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (289)

एक नहीं मानेंगे अब हम वृन्दावन जावेंगे - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (289)

(राग ज़िला)
एक नहीं मानेंगे अब हम वृन्दावन जावेंगे ।
रूखी सूखी घीकी चुपड़ी पावेंगे सो खावेंगे ।। [1]
ललित किशोरी कोन कचोने परे कुंज गुन गावेंगे ।
अवलोकत छवि जुगुलाल की त्रिभुवन सुख विसरावेंगे ।। [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (289)

हम एक भी नहीं मानेंगे अब अब वृंदावन जाएंगे। जो भी रूखा, सूखा, या फिर घी में चुपड़ा हुआ मिलेगा वह खा कर ही गुजारा करेंगे । [1]

श्री ललित किशोरी कहते हैं कि श्री वृंदावन के कोने में किसी कुंज में पड़े रहकर श्री युगल सरकार [राधा कृष्ण] के गुण गा गा कर, श्री युगल छवि का अवलोकन कर त्रिभुवन का सुख भी ठुकरा देंगे । [2]