अंग संग सो प्रेम बरखत, सकल सुख की मूरि ।
राधेज़ू के चरण की रज, गदाधर सिर भूरि॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी
श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि जिनके अंग-संग से साक्षात प्रेम की ही वर्षा होती है, जो समस्त सुखों की आधार हैं, ऐसी श्री राधे जू की चरण-रज मैं अपने सिर पर सम्पूर्ण रूप से धारण करता हूँ।
राधेज़ू के चरण की रज, गदाधर सिर भूरि॥
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी
श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि जिनके अंग-संग से साक्षात प्रेम की ही वर्षा होती है, जो समस्त सुखों की आधार हैं, ऐसी श्री राधे जू की चरण-रज मैं अपने सिर पर सम्पूर्ण रूप से धारण करता हूँ।

