भक्तिवर्धिनी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

भक्तिवर्धिनी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

यथा भक्तिः प्रवृद्धा स्यात्तथोपायो निरूप्यते।
बीजभावे दृढ़े तु स्यात्यागाच्छ्रवणकीर्तनात्‌॥ [1]

अब मैं भक्ति की वृद्धि करने का उपाय बताता हूँ। जब भक्ति का बीज दृढ़ हो जाता है तो उस भक्ति को सांसारिक आसक्ति के त्याग से, कृष्ण कथा सुनने से और कृष्ण नाम के कीर्तन से बढ़ाया जा सकता है ।

बीजदाढ्‌र्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः।
अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः॥ [2]

घर में रहकर ही अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए ही भक्ति का बीज दृढ़ होता है, सांसारिक इच्छाओं को सीमित कर मन को स्थिर करके श्री कृष्ण की भक्ति के द्वारा, श्रवण भक्ति आदि विधियों से भगवान श्रीकृष्ण का भजन करना चाहिये।

व्यावृतोपि हरौ चित्तं श्रवणादौ यतेत्सदा।
ततः प्रेम तथासक्तिर्व्यसनं च यदा भवेत्‌॥ [3]

सांसारिक कर्तव्य होते हुए भी चित्त को श्री हरि [की स्तुति] के श्रवण आदि में लगाए रखते हुए मन को हरि में ही केंद्रित करें और तब तक लगाये रखना चाहिये जब तक भगवान से प्रेम, आसक्ति एवं राग उत्पन्न न हो जाये।

बीजं तदुच्यते शास्त्रे दृढ़ं यन्नापि नश्यति।
स्नेहाद्रागविनाशः स्यादासक्त्या स्याद् ‌गृहारुचिः॥ [4]

शास्त्रों के अनुसार भक्ति के बीज को तभी दृढ़ स्थित कहा जा सकता है जब-तक अन्य किसी के प्रति प्रेम और आसक्ति नहीं रह जाती है और घर के प्रति स्वत: ही आसक्ति का अन्त नहीं हो जाता है।

गृहस्थानां बाधकत्वमनात्मत्वं च भासते।
यदा स्याद्वयसनं कृष्णे कृतार्थः स्यात्तदैव हि॥ [5]

जब कोई पूर्ण रूप से श्रीकृष्ण से आसक्त हो जाता है और उनके बिना रह नहीं सकता, तो वह धन्य जीव भक्ति की उत्कृष्टता को प्राप्त कर लेता है।

तादृशस्यापि सततं गृहस्थानं विनाशकम्‌।
त्यागं कृत्वा यतेद्यस्तु तदर्थार्थैकमानसः॥ [6]

भक्ति से संपन्न व्यक्ति सांसारिक घर को भक्ति में बाधा अनुभव करता है । त्याग केवल इसलिए है जिससे मन और हृदय को एकाग्र कर भक्ति में और लीन किया जा सके ।

लभते सुदृढ़ां भक्तिं सर्वतोप्यधिकां पराम्‌।
त्यागे बाधकभूयस्त्वं दुःसंसर्गात्तथान्नतः॥ [7]

दृढ़ भक्ति [विशुद्ध] की प्राप्ति सबसे श्रेष्ठ है। यदि समय से पहले त्याग हो, तो व्यक्ति कई बाधाओं में पड़ जाता है जैसे कि दुष्ट लोगों की संगति और अपवित्र, अशुद्ध भोजन।

अतस्थेयं हरिस्थाने तदीयैः सह तत्परेः।
अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यति॥ [8]

और इसलिए ऐसे स्थान पर निवास करना चाहिए जो श्री हरि की भक्ति में सहायक हो। इसलिए अन्य भक्तों के साथ संग करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो श्री हरि के प्रिय भक्त बन गए हैं। अन्य भक्तों के साथ रहने और उचित दूरी रखने के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए जिससे मन को कभी भी नकारात्मकता का अनुभव न हो [मन दूषित न हो]।

सेवायां वा कथायां वा यस्यासक्तिर्दृढ़ा भवेत्‌।
यावज्जीवं तस्य नाशो न क्वापीति मतिर्मम॥ [9]

भगवान की सेवा करने से या भगवान की कथा श्रवण करने से जिस प्रकार से भी भगवान के प्रति आसक्ति दृड़ हो सके, इस प्रकार जीवन की अन्तिम श्वांस तक सेवा या श्रवण करते रहना चाहिए, ऐसा श्रीवल्लभाचार्य जी का कथन है।

बाधसंभावनायं तु नैकान्ते वास इष्यते।
हरिस्तु सर्वतो रक्षां करिष्यति न संशयः॥ [10]

किसी बाधा की संभावना से एकान्त में रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिये बल्कि भय मुक्त होकर एकान्त में रहना चाहिये, क्योंकि भगवान श्रीहरि निश्चित रूप से सभी प्रकार से रक्षा करते हैं, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिये।

इत्येवं भगवच्छास्त्रं गूढतत्वं निरूपितम्‌।
य एतत्‌समधीयीत तस्यापि स्याद्‌ दृढ़ा रतिः॥ [11]

इस प्रकार भगवत प्राप्ति की इच्छा वालों के लिये शास्त्रों के गूढ़ तत्त्व का निरूपण किया गया है, जो भी इस विधि का दृड़ता-पूर्वक पालन करता है, वह भगवान में दृढ़ स्थित हो ही जाता है।