प्रिया पीतांबर मुरली जीती - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (40)

प्रिया पीतांबर मुरली जीती - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (40)

(राग केदारौ)
प्रिया पीतांबर मुरली जीती ।
हा हा करत न देत लाड़िली, चरन लुठति निसि बीती ।। [1]
राखौ याहि दुराइ सखी, ललितादिक रहौ सचीती ।
श्रीबीठलविपुल विनोद बिहारिन प्रगट करत रस रीती ।। [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (40)

श्री प्रिया [राधा] ने होड़ में लाल से पीताम्बर और मुरली को श्याम सुंदर से जीत लिया है । यद्यपि लाल को, हा-हा कर प्रिया चरणारविन्द में लुंठित होकर पड़ते हुए सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत हो गई पर उन जीती हुई वस्तुओं को वे वापिस नहीं कर रही हैं। [1]

यही नहीं, वे ललितादिक सखियों को इन दोनों वस्तुओं को सौंपती हुई कहती हैं कि उन्हें ठीक से छिपा कर रखना और सावधान रहना कि कहीं ये नटनागर छल-बल से इन्हें ले न लें। इस प्रकार विपुल विनोद की वृद्धि करती हुई प्रिया, आज इस निकुंज में विलक्षण रस-रीति को प्रकाशित कर रही हैं । [2]