आस्तां दुर्मतिकोटिर्दुश्चेष्टा कोटिरप्यास्ताम् ।
परिभूतिकोटिरस्तु श्रीवृन्दारण्य माऽस्तु ते विरहः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.62)
कोटि-कोटि दुर्बुद्धि आवें अथवा कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएँ हो जाएँ या कोटि-कोटि अपयश ही क्यों न हो जाएँ, तथापि हे श्रीवृन्दावन! मैं आपसे विलग कभी न हो जाऊँ, यही मेरी प्रार्थना है ।
परिभूतिकोटिरस्तु श्रीवृन्दारण्य माऽस्तु ते विरहः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.62)
कोटि-कोटि दुर्बुद्धि आवें अथवा कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएँ हो जाएँ या कोटि-कोटि अपयश ही क्यों न हो जाएँ, तथापि हे श्रीवृन्दावन! मैं आपसे विलग कभी न हो जाऊँ, यही मेरी प्रार्थना है ।

