रंगीली करत रंगीली बात - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (93)

रंगीली करत रंगीली बात - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (93)

(राग विहागरौ)
रंगीली करत रंगीली बात ।
सुनि सुनि नवल रसिक मन-मोहन, फिरि-फिरि फिरि ललचात ।। [1]
चितै चितै मुख मधुर माधुरी, उरजनि सौं लपटात।
'हित ध्रुव' रस को सिंधु उमड़ि चल्यौ, पिय के हिय न समात ।। [2]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (93)

आज रँग रँगीली प्रिया अपने प्रियतम से उमग-उमग कर रस-मरी वार्ता कर रही हैं। जिसे पुनः पुनः श्रवण करके श्री नवल रसिक मन-मोहन प्रियतम उस वार्ता को सुनते ही रहने के लिए बार-बार ललचा रहे हैं। [1] 

रसिक प्रियतम श्री प्रिया मुख की महा मधुर माधुरी का बारम्बार अवलोकन करके रस-विभोर हुए प्रिया के हृदय से लिपट-लिपट पड़ते हैं। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रियतम के हृदय में रस का समुद्र उमड़ चलता है, जो किसी भी प्रकार रोका नहीं जा सकता और बाहर उछल आता है। [2]