वपुर्मनो वागसवस्त्वयि - श्री वृषभानुपुर शतक (83), श्री वंशी अली द्वारा रचित

वपुर्मनो वागसवस्त्वयि - श्री वृषभानुपुर शतक (83), श्री वंशी अली द्वारा रचित

वपुर्मनो वागसवस्त्वयि प्रिये निर्वाञ्छिता मे सततं वदामि ते ।
त्वयैव दत्तं मम जीवनं पुनस्त्वत्पाद संस्पर्शमुखाभिलाषतः ॥

- श्री वृषभानुपुर शतक (83), श्री वंशी अली द्वारा रचित

श्रीकृष्णचन्द्र प्रियाजी से कह रहे हैं – हे प्रिये ! मेरा शरीर, मन, वाणी एवं प्राण आप में ही हैं, आप निरन्तर मेरे द्वारा नितरां एकमात्र वाञ्छनीय हो अर्थात् सर्वदा आप की इच्छा करता रहता हूँ, मैं सत्य कह रहा हूँ, आपके चरण-स्पर्श की अभिलाषा से युक्त मेरा जीवन आपके ही द्वारा दिया गया है ।