नाथ मोहिं अब की बेर उबारो ।
कर्महीन जनम को अंधो, मो तें कौन नकारो ।। [1]
तीन लोक के तुम प्रतिपालक, मैं तो दास तिहारो ।
तारी जाति कुजाति प्रभु जी, मो पर किरपा धारो ।। [2]
पतितन में इक नायक कहिए, नीचन में सरदारो ।
कोटि पापी इक पासंग मेरे, अजामिल कौन बिचारो ।। [3]
नाठो धरम नाम सुनि मेरो, नरक कियो हठ तारो ।
मोको ठौर नहीं अब कोऊ, अपनो बिरद समहारो ।। [4]
छुद्र पतित तुम तारे रमापति, अब न करो जिय गारो ।
सूरदास साचो तब माने, जो ह्वै मम निस्तारो ।। [5]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे नाथ, मुझे अबकी बार उबार लीजिए ।मैं कर्महीन एवं जन्म से अंधा हूँ, मुझसे अधिक नकारा कौन हो सकता है? [1]
हे नाथ, आप तीनों लोकों के पालनकर्ता हो और मैं आपका दास हूँ। आपने समस्त जीवों का उद्धार किया है चाहे वह नीच जाति का हो या उच्च कुल का; मेरे ऊपर भी कृपा कर मेरा कल्याण करो । [2]
मैं पतितों का मुखिया और नीचों में सरदार हूँ । मेरे मुक़ाबले में कोटि कोटि पापी कुछ भी नहीं हैं, मुझ जैसे पापी के समक्ष अजामिल जैसा पापी भी तुच्छ है । [3]
मेरा नाम सुनते ही धर्म भाग जाता है। नरक भी मुझे स्वीकार करने से मना कर देता है। हे नाथ, आपके अतिरिक्त अब मेरे पास जाने के लिए कोई और ठौर नहीं है । मैं आपसे आपके “पतित पावन”, “अकारण करुणा” इत्यादि गुणों को विचारने की प्राथना करता हूँ । [4]
हे नाथ, आपने अनेक छुद्र एवं पतित जीवों का उद्धार किया है, अब अपनी प्रतिष्ठा को ख़राब न करें। सूरदास जी कहते हैं कि मैं हृदय से आपको तभी पतितपावन मानूँगा जब आप मेरे जैसे पतित का भी कल्याण करेंगे । [5]
कर्महीन जनम को अंधो, मो तें कौन नकारो ।। [1]
तीन लोक के तुम प्रतिपालक, मैं तो दास तिहारो ।
तारी जाति कुजाति प्रभु जी, मो पर किरपा धारो ।। [2]
पतितन में इक नायक कहिए, नीचन में सरदारो ।
कोटि पापी इक पासंग मेरे, अजामिल कौन बिचारो ।। [3]
नाठो धरम नाम सुनि मेरो, नरक कियो हठ तारो ।
मोको ठौर नहीं अब कोऊ, अपनो बिरद समहारो ।। [4]
छुद्र पतित तुम तारे रमापति, अब न करो जिय गारो ।
सूरदास साचो तब माने, जो ह्वै मम निस्तारो ।। [5]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे नाथ, मुझे अबकी बार उबार लीजिए ।मैं कर्महीन एवं जन्म से अंधा हूँ, मुझसे अधिक नकारा कौन हो सकता है? [1]
हे नाथ, आप तीनों लोकों के पालनकर्ता हो और मैं आपका दास हूँ। आपने समस्त जीवों का उद्धार किया है चाहे वह नीच जाति का हो या उच्च कुल का; मेरे ऊपर भी कृपा कर मेरा कल्याण करो । [2]
मैं पतितों का मुखिया और नीचों में सरदार हूँ । मेरे मुक़ाबले में कोटि कोटि पापी कुछ भी नहीं हैं, मुझ जैसे पापी के समक्ष अजामिल जैसा पापी भी तुच्छ है । [3]
मेरा नाम सुनते ही धर्म भाग जाता है। नरक भी मुझे स्वीकार करने से मना कर देता है। हे नाथ, आपके अतिरिक्त अब मेरे पास जाने के लिए कोई और ठौर नहीं है । मैं आपसे आपके “पतित पावन”, “अकारण करुणा” इत्यादि गुणों को विचारने की प्राथना करता हूँ । [4]
हे नाथ, आपने अनेक छुद्र एवं पतित जीवों का उद्धार किया है, अब अपनी प्रतिष्ठा को ख़राब न करें। सूरदास जी कहते हैं कि मैं हृदय से आपको तभी पतितपावन मानूँगा जब आप मेरे जैसे पतित का भी कल्याण करेंगे । [5]

