न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै - श्री सुंदर जी

न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै - श्री सुंदर जी

न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै।
न संक भूत-प्रेतकी, न देव-जच्छते डरै॥ [1]
सुनै न कान और की, दरसै न और इच्छना।
कहै न बात और की, सुभक्ति प्रेमलच्छना॥ [2]
कबहुँक हँसि उठि नृत्य करै रोवन फिर लागे।
कबहुँक गदगद कंठ, सबद निकसें नहिं आगे॥ [3]
कबहुँक हृदै उमंग बहुत ऊँचे सुर गावै।
कबहुँक ह्वै मुख मौन गगन जैसो रहि जावै॥ [4]
चित्त बित्त हरिसों लग्यो सावधान कैसे रहै।
यह प्रेमलच्छना भक्ति है, शिष्य सुनो, 'सुन्दर' कहै॥ [5]

- श्री सुंदर जी

रसिकों द्वारा वर्णित दिव्य प्रेम के मार्ग में साधक की आवश्यक मनोवृत्ति का वर्णन करते हुए श्री सुंदर जी कहते हैं:

रसिक भक्त को न तो तीनों लोकों की लाज का भय होता है और न ही वेदों की अवज्ञा का। न भूत प्रेत इत्यादि से वह तनिक भी डरता है और न ही देवता इत्यादि का उसे कुछ भय होता है। [1]
 
वह न किसी की सुनता है और न कुछ देखने की इच्छा रखता है। वह अपने प्रियतम को छोड़कर किसी अन्य के विषय में गुणगान नहीं करता। यह उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो दिव्य प्रेम मार्ग का अनुयायी है। [2]
 
वह कभी हंसता है और फिर रोने लगता है। कभी-कभी वह इतना गदगद हो जाता है कि उसकी वाणी से कुछ भी शब्द नहीं निकलते। [3]
 
कभी वह हर्षित होकर उच्च स्वर में गाने लगता है और कभी आकाश के समान मौन धारण कर लेता है। [4]
 
उसका हृदय एवं चेष्टाएँ हरि से लगी हुई हैं, वह अब कैसे सावधान रह सकता है ? श्री सुंदर जी कहते हैं कि अरे शिष्यों, सनो!  प्रभु के प्रेम मार्ग में चलने वाले व्यक्ति के ऐसे लक्षण होते हैं। [5]