श्री बिहारीदास हरिदास कौ, संतत सुखद विहार ।
कर्मठ फाटै चैंथरा, गाँठि बाँधि अंगार ॥
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (215)
हे बिहारीदास! तुम भली-भाँति सोच-विचार कर देख लो कि एक श्री स्वामीजू (हरिदास जी) का नित्य-विहार ही अखंड रूप से समस्त भाँति, सदाकाल सर्वोपरि सुखदायी रस बरसाने वाला है। शेष सब लोग कर्मकांड और विधि-निषेध के जंजाल में उलझे हैं जिनका स्वरूप ऐसा है जैसे पहले तो फटे-पुराने चीथड़े पहने हों, फिर उसमें जलता हुआ अंगार गले से बाँध दिया हो। अर्थात् कर्मादिक जंजाल, विधि-निषेध में फँस-फँसकर विशुद्ध रूप से श्री श्यामा-श्याम को नित्य लाड़ कोई कैसे लड़ा सकता है?
कर्मठ फाटै चैंथरा, गाँठि बाँधि अंगार ॥
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (215)
हे बिहारीदास! तुम भली-भाँति सोच-विचार कर देख लो कि एक श्री स्वामीजू (हरिदास जी) का नित्य-विहार ही अखंड रूप से समस्त भाँति, सदाकाल सर्वोपरि सुखदायी रस बरसाने वाला है। शेष सब लोग कर्मकांड और विधि-निषेध के जंजाल में उलझे हैं जिनका स्वरूप ऐसा है जैसे पहले तो फटे-पुराने चीथड़े पहने हों, फिर उसमें जलता हुआ अंगार गले से बाँध दिया हो। अर्थात् कर्मादिक जंजाल, विधि-निषेध में फँस-फँसकर विशुद्ध रूप से श्री श्यामा-श्याम को नित्य लाड़ कोई कैसे लड़ा सकता है?

