कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगो यह डोरो - श्री ठाकुर जी

कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगो यह डोरो - श्री ठाकुर जी

(सवैया)
कानन दूसरो नाम सुनै नहिं, एकहि रंग रँगो यह डोरो।
धोखेहुँ दूसरो नाम कढै, रसना मुख बाँधि हलाहल बोरो॥ [1]
ठाकुर चित्तकी वृत्ति यहै, हम कैसेहुँ टेक तजैं नहिं भोरो।
बावरी वे अखियाँ जरि जायँ, जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो॥ [2]

- श्री ठाकुर जी

ठाकुर श्री बाँके बिहारी का एक अनन्य भक्त अपनी अनन्यता प्रकट करता हुआ कहता है—
इन कानों को अब किसी दूसरे नाम का श्रवण पसंद नहीं; यह मन तो केवल एक ही रंग में डूबा हुआ है। यदि भूल से भी मेरी जीभ पर किसी और का नाम आ जाए, तो मैं उसे रोककर विष पी लूँ। [1]

श्री ठाकुर कहते हैं—मेरे चित्त की अब यही दृढ़ वृत्ति है कि मैं अपने इस अनन्य व्रत को अनजाने में भी नहीं तोड़ सकता। ये बाँवरी आँखें जल जाएँ यदि वे श्री बाँके बिहारी की साँवली छवि को छोड़कर किसी और को निहारना चाहें। [2]