अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (13)

अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (13)

(कवित्त)
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति,
माधुरी विपिन की कौन जानी। [1]
रति मैंन की सैंन लोटत जहाँ रैन दिन,
उमा और रमा सब सुधि भुलानी॥ [2]
नेत कहि नेत कहि निगम कौं दुर्गम अति,
नारदहि कछु श्री पति बखानि। [3]
परै सोइ आई अलबेली नैंननि कबै
राज जहाँ राधिका कुंवरि रानी॥ [4]

- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (13)

जहां अनुरागपूर्वक रूप और गुण हर क्षण खड़े (विद्यमान) रहते हैं, ऐसी वृंदावन की माधुरी को कौन जान सकता है? [1]

जिस वृंदावन की रज में रतिपति अर्थात् कामदेव भी दिन रात लोटता रहता है, और उमा एवं रमा भी जिसका दर्शन कर अपनी सुधि भुला देती हैं। [2]

जिस अति दुर्गम ठौर (श्री वृंदावन धाम) को वेदों ने ‘नेति नेति’ (पहुँच से परे) कहकर पुकारा है, उसका कुछ वर्णन भगवान ने नारद को बताया है। [3]

श्री अलबेली अलि कहते हैं कि वही अद्भुत श्री वृंदावन धाम उनके नैनों में समाया हुआ है, जो श्री राधा का अभिन्न स्वरूप है, जहां श्री राधा महारानी का नित्य राज है। [4]