नारायण जाको हियो, बिंध्यो, श्याम दृग बान  - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (174)

नारायण जाको हियो, बिंध्यो, श्याम दृग बान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (174)

नारायण जाको हियो, बिंध्यो, श्याम दृग बान ।
जगके भावें जीवतो, है वह मृतक समान ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (174)

जिसके हृदय को श्री श्यामसुंदर के तिरछे कटाक्ष-बाण ने भेद दिया हो, वह बाह्य दृष्टि से भले ही संसार को जीवित प्रतीत हो, पर भीतर से वह सांसारिक चेतना से रहित होकर मानो मृतक-समान हो जाता है।