गिरि से गिराओ हमें - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (61)

गिरि से गिराओ हमें - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (61)

गिरि से गिराओ हमें गज से दबाओ हमें,
अतुल निर्दयता से अग्नि में जलाओ नाथ। [1]
काल से डसाओ हमें व्याधि से ग्रसाओ हमें,
शंभु से छिनाकर हलाहल पिलाओ नाथ॥ [2]
सिंह से लड़ाओ हमें सिन्धु में डुबाओ हमें,
विजन विपिन बीच बिजली गिराओ नाथ। [3]
घोर से भी घोर दुःख दारुण दिखाओ किन्तु,
हाय! हाय ! वृन्दावन-बास ना छुड़ाओ नाथ॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (91)

हे नाथ, चाहे पहाड़ से हमें गिरवा दो, या हाथी से कुचलवा दो, या अतुल्य निर्दयता से अग्नि में जलवा दो। [1]

हे नाथ, चाहे सांप से डसाओ, किसी रोग से कष्ट उत्पन्न हो, अथवा श्री शंकर जी से हलाहल छिना कर हमें ही क्यूं न पिला दो। [2]

चाहे सिंह से हमला करवा दो, चाहे सिंधु में हमको डुबा दो, अथवा कहीं एकांत में बिजली ही हमारे ऊपर गिरवा दो। [3]

चाहे घोर से घोर दुःख एवं दारुण भले ही दिखा दो, परंतु हे नाथ, श्री वृंदावन वास कदापि हमसे ना छुड़वाओ। [4]