किशोरी जू मोहे भरोसौ तेरो। [1]
तुम बिन मेरो कोई नहीं है, सब जग माँझ अँधेरो।
मेरी तो तुम ही हो सर्वस, और न दूजो हेरो॥ [2]
नहि विद्या जप तप व्रत संयम, मेरे खूट न खेरो।
'प्रियाशरण' विनवत कर जोरे, कुञ्जन मांही बसेरो॥ [3]
- श्री प्रिया शरण जी
हे किशोरी जी, मुझे तो केवल एक आपका ही भरोसा है। [1]
हे किशोरी जी! तुम्हारे बिना तो मेरा अपना कोई भी नहीं है, पूरे जग में मानो अंधेरा ही पड़ा हो। मेरी तो एक मात्र आप ही सर्वस्व हो, अन्य किसी की ओर मैं दृष्टि भी नहीं डालता, चाहे वह कितना ही महान क्यूँ न हो। [2]
न मेरे पास विद्या का बल है, न जप, तप, व्रत, संयम इत्यादि का ही एवं न ही आपके चरणों के अतिरिक्त कोई निवास स्थान शेष रह गया है। श्री प्रियाशरण जी कहती हैं कि मैं दोनों हाथों को जोड़ कर विनती करती हूँ कि मुझे नित्य अपने चरणों में अर्थात् वृंदावन की कुंजों में ही बसाए रखिए। [3]
तुम बिन मेरो कोई नहीं है, सब जग माँझ अँधेरो।
मेरी तो तुम ही हो सर्वस, और न दूजो हेरो॥ [2]
नहि विद्या जप तप व्रत संयम, मेरे खूट न खेरो।
'प्रियाशरण' विनवत कर जोरे, कुञ्जन मांही बसेरो॥ [3]
- श्री प्रिया शरण जी
हे किशोरी जी, मुझे तो केवल एक आपका ही भरोसा है। [1]
हे किशोरी जी! तुम्हारे बिना तो मेरा अपना कोई भी नहीं है, पूरे जग में मानो अंधेरा ही पड़ा हो। मेरी तो एक मात्र आप ही सर्वस्व हो, अन्य किसी की ओर मैं दृष्टि भी नहीं डालता, चाहे वह कितना ही महान क्यूँ न हो। [2]
न मेरे पास विद्या का बल है, न जप, तप, व्रत, संयम इत्यादि का ही एवं न ही आपके चरणों के अतिरिक्त कोई निवास स्थान शेष रह गया है। श्री प्रियाशरण जी कहती हैं कि मैं दोनों हाथों को जोड़ कर विनती करती हूँ कि मुझे नित्य अपने चरणों में अर्थात् वृंदावन की कुंजों में ही बसाए रखिए। [3]

