बाटन में घाटन में बीथिन में बागन में - ब्रज के कवित्त

बाटन में घाटन में बीथिन में बागन में - ब्रज के कवित्त

बाटन में घाटन में बीथिन में बागन में,
वृक्षन में बेलिन में वाटिका में वन में। [1]
दरन में दिवारिन में देहरी दरीचन में,
हीरन में हारन में भूषन में तन में॥ [2]
कानन में कुंजन में गोपिन में गायन में,
गोकुल में गोधन में दामिन में घन में। [3]
जहाँ जहाँ दखौं तहाँ श्याम ही दिखाई देत,
सालिगराम छाइ रह्यो नैनन में मन में॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

एक गोपी कहती है :

गलियों में, घाटों पर, बीथियों में, बगीचों में, वृक्षों में, बेलों में, वाटिका में और वन में। [1]

दरवाजों पर, दीवारों पर, देहरी पर, खिड़कियों पर, हीरे में, हार में, गहनों में, तन में। [2]

कानन में, कुंजों में, गोपियों में, गायों में, गोकुल में गोधन में, बिजली में और बादलों में। [3]

मैं जिस दिशा में भी देखता हूं, मुझे केवल श्यामसुंदर ही दिखते हैं, श्याम ही है जो मेरी आँखों में समाया हुआ है और मेरे हृदय में नित्य ही बसा हुआ है। [4]