प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (5)

प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं - जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्त्रोत (5)

प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं युग्मस्वरूपमनिशं सुमनोहरं च।
लावण्यधाम ललनाभिरुपेयमान मुत्थाप्यमानमनुमेयमशेषवेषैः ॥

- जगद्गुरु आद्यनिम्बार्काचार्य, प्रात: स्मरण स्तोत्र (5)

व्रजसुन्दरियों (की अनन्य प्रीतिके कारण उन) — के प्राप्यरूप तथा उनके द्वारा प्रभातवेला में जगाये जाते हुए, सभी प्रकार की वेष-रचनाओं से समन्वित हुए जो चिन्तन का विषय बनते हैं, जो निरतिशय सौन्दर्य के आश्रय तथा (भक्तों के द्वारा) अन्त:करण में निरन्तर चिन्तनयोग्य हैं — ऐसे उन राधा-माधव के युगल स्वरूप का मैं प्रातःकाल अपने हृदय में ध्यान करता हूँ ।