अहो मधु-पुरी धन्या - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.237)

अहो मधु-पुरी धन्या - श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.237)

अहो मधु-पुरी धन्या वैकुण्ठाच् च गरीयसी ।
दिनम् एकं निवासेन हरौ भक्तिः प्रजायते ॥

- श्री रूप गोस्वामी, भक्ति रसामृत सिंधु (1.2.237)

ऐसा कौन सा बुद्धिमान व्यक्ति है जो ब्रज मंडल की शरण नहीं लेगा जिस धाम को वैकुंठ धाम से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है, जहां केवल एक दिन भी भाव से रहने से भगवान की भक्ति जागृत हो जाती है ।