अहो विधना ! तो पै अचरा पसारि मांगों - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

अहो विधना ! तो पै अचरा पसारि मांगों - श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

(राग गौरी)
अहो विधना ! तो पै अचरा पसारि मांगों, 
जनम-जनम दीजो मोहि याही ब्रजबसिबो ।
अहीर की जाति समीप नन्द घर हेरि-हेरि,
स्याम सुभग घरी घरी हंसिबो ।। [1]
दधि के दान मिस ब्रज की वीथिन,
झकझोरन अंग-अंग को परसिबो ।
'छीतस्वामी' गिरिधरन श्रीविठ्ठल,
सरद रैनु रस-रास विलसिबो ।। [2]

- श्री छीत स्वामी (अष्टछाप कवि)

श्री छीतस्वामी परमात्मा से [विधाता से] यही आँचल पसार कर अनुग्रह की याचना करते हैं कि उन्हें सदा जन्म जमान्तर में ब्रज में ही वास मिले, एवं अहीर जाति में जन्म मिले, एवं उनका घर नन्द बाबा के घर के समीप हो, जिससे वे हर घड़ी श्यामसुंदर के दर्शन कर सकें, उनके साथ हंस-खेल सकें । [1]

श्रीकृष्ण ने जिन ब्रज की गलियों में गोपिकाओं के अंग-अंग को झकझोर करके शिथिल करके, प्रेम वश करके दधिदान माँगा था। उन गलियों की रज का वह स्पर्श करके सदा आनंदित रहना चाहते हैं । जब श्री विठ्ठलेश श्रीकृष्ण शरद पूर्णिमा की रात्रि को गोपिकाओं के साथ 'रस-रास' लीला करते हों तब वह भी उस निरवध लीला का रस पाना चाहते हैं । [2]