जनम-जनम वास वृन्दावन दीजै मोकौं - श्री ब्रजजीवन जी

जनम-जनम वास वृन्दावन दीजै मोकौं - श्री ब्रजजीवन जी

जनम-जनम वास वृन्दावन दीजै मोकौं,
जनम-जनम प्यारी जू तेरौ गुन गाऊँ मैं । [1]
जनम जनम तेरी चेरिन की चेरी हौं मैं,
सुन्दर चरन मेंहदी जावक रचाऊँ मैं ।। [2]
पानदान, अतरदान आदि सब सेवा करौं,
व्यंजन साँवरि नित नौतन जिमाऊँ मैं । [3]
‘ब्रजजीवन’ स्वामिनि झमकि नाचैं मोहन सँग,
मधुर मृदंगन की परन बजाऊँ मैं ।। [4]

- श्री ब्रजजीवन जी

हे प्यारी जू [श्री राधा] जन्म-जन्म मुझे वृंदावन का वास प्रदान कीजिए और मैं आपका ही गुणगान करता रहूँ। [1]

जन्म जन्मांतर मैं आपकी दासियों की दासी बनकर रहूँ, एवं आपके सुंदर चरणों में मेहंदी एवं जावक की रचना करूँ। [2]

मैं आपकी विभिन्न प्रकार की सेवायें जैसे पानदान, इतरदान इत्यादि सब करूँ, एवं आपको विभिन्न नवीन व्यंजन संवार कर जिमाऊँ । [3]

श्री ब्रज जीवन जी कहते हैं कि हे स्वामिनी, जब आप श्याम सुंदर संग प्रफुल्लित होकर नाच रही हों तो मैं मधुर मृदंग बजाया करूँ । [4]