मोहिं तुम्हैं बाढ़ी बहस, को जीतै जदुराज।
अपनैं-अपनैं बिरद की, दुहूँ निबाहन लाज॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (427)
हे बाँके बिहारी! मेरे और तुम्हारे बीच मानो एक बहस छिड़ गई है—अब देखना है कि अंततः कौन जीतता है। तुम्हें अपने कृपालु स्वभाव की लाज रखनी है और मुझे अपने पतनशील स्वभाव की; तुम मेरा उद्धार करना चाहते हो और मैं बार-बार अपराध करके गिरता जा रहा हूँ।
अपनैं-अपनैं बिरद की, दुहूँ निबाहन लाज॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (427)
हे बाँके बिहारी! मेरे और तुम्हारे बीच मानो एक बहस छिड़ गई है—अब देखना है कि अंततः कौन जीतता है। तुम्हें अपने कृपालु स्वभाव की लाज रखनी है और मुझे अपने पतनशील स्वभाव की; तुम मेरा उद्धार करना चाहते हो और मैं बार-बार अपराध करके गिरता जा रहा हूँ।

