को सरि करै हमारी राधा - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (151)

को सरि करै हमारी राधा - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (151)

को सरि करै हमारी राधा ।
यदपि नाम महातम सेवत और वैस या रस में बाधा ।। [1]
अंग संग नवलकिसोर किसोरी एक वैस रस सिंधु अगाधा ।
जागत अनुरागत निसिवासर लगत न नैन निमेष न आधा ।। [2]
नित्यविहार अधार हमारें एक प्रेम निज नाम अराधा ।
श्रीबिहारीदास हरिदास बिपुलबल सब अभिलाष मिली सुखसाधा ।। [3]

- श्री बिहारिन देव , श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (151)

[यह पद बहुत महत्वपूर्ण है स्वामी हरिदास जी की नित्य विहार उपासना को समझने के लिए]
हमारी सर्वोपरि नित्यबिहारिनी स्वामिनी स्वरूपा श्री राधा की समानता कौन कर सकता है? यद्यपि श्री राधा नाम महात्म के आधार पर उपासक श्री राधा को एक समान ही समझते हैं, परंतु श्री राधा का भी सूक्ष्म से सूक्ष्म से अति सूक्ष्म रस है, अर्थात् श्री राधा के भी अन्य वैस [स्वरूप] इस अति अद्बुत नित्य विहार रस में बाधा ही हैं ।  जैसे ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार गोलोक लीला में श्री राधा को श्रीदामा ने श्राप दिया और उन्हें 100 वर्ष का कृष्ण से वियोग हुआ । यह भी राधा का एक स्वरूप है । पुनः बरसाना में राधा का बाल स्वरूप भी है । श्रीमद् भागवत के अनुसार महारास में जब एकांत में श्री राधा को कृष्ण ले गए, पुनः श्री राधा को छोड़ कर श्री कृष्ण अंतरध्यान हो गए । यहाँ भी राधा का अलग स्वरूप है । फिर इसके आगे स्वाकिया भाव में ब्रज लीला में ठाकुर जी सुबह गाय चराने जाते हैं फिर श्री राधा से बरसाने में मिलते हैं, यहाँ पर भी समय समय में स्थूल संयोग वियोग है ।  पराकिया भाव में तो पल पल वियोग है । यदि देखा जाए तो राधा के अलग अलग स्वरूप हैं, अत: इस नित्य विहार रस में श्री राधा का अन्य रस भी बाधा है । [1]

श्री वृंदावन धाम के नव निकुंज में अखंड नित्य विहार लीला में श्री राधा कृष्ण नवल किशोर हैं, उनका व्यस [आयु] भी समान अर्थात् नित्य किशोर अवस्था ही है, एवं रस विलास भी एक तरह का है अर्थात् न तो इन्हें भूख लगती है, न निद्रा है, न अन्य लीलाएँ हैं, न ब्रज लीला के अनुसार गाय, गोप, गोपी इत्यादि हैं । यहाँ तो बस प्रिया प्रियतम अपलक नेत्रों से एक दूसरे को निहारते रहते हैं एवं आधे क्षण को भी विलास क्रीड़ा के अतिरिक्त कुछ नहीं करते । [2]

इस अति अद्बुत अखंड नित्य विहार लीला की स्वामिनी हमारी नित्य विहारिनी श्री राधिका जू हैं जिनके ठाकुर नित्य दास हैं । यह स्वामिनी जी को एक क्षण के लिए भी लाड़ लड़ाने से पीछे नहीं हटते, अत: हमारी नित्यविहारिनी राधा की समानता किसी अन्य स्वरूप से नहीं की जा सकती । इन युगल का सर्वोपरि नित्य विहार ही हमारे प्राणों का आधार है, और इनको प्राप्त करने का साधन अनन्य भाव से विशुद्ध प्रेम पूर्वक इन्हें लाड़ लड़ाते हुए इनके निज नाम की आराधना करना है । श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि स्वामीजी [स्वामी श्री हरिदास] एवं वीठल विपुल देव जी महाराज की कृपा बल से हमारी समस्त अभिलाषायें पूर्ण हो गयी हैं । [3]